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New Delhi, Delhi, India
Flutist of Indian Classical music genre

Monday, May 1, 2017

स्टार पुत्र

भाई साहब ••••

क्या है?

मेरी बारी कब आएगी ••••

किस बात की बारी?

मेरे कार्यक्रम कब करवाएंगे आप ••••

कार्यक्रम! ...  आप कौन हैं भाई ?

जी मैं तो एक कलाकार हूँ ••••

अच्छा, कलाकार हैं आप?

जी हाँ ••••

तो हमारे पास क्यों आये हैं?

जी मैंने सुना है की आप कलाकारों के कार्यक्रम आयोजित करवाते हैं  .... 

हम तो स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित करवाते हैं, वो भी मुफ़्त 

पर मैंने तो सुना है की आप कुछ मानधन भी देते हैं कलाकारों को 

हाँ थोड़ा बहुत दे देते हैं।  हमारे पास पैसा ही कहाँ है?

पर मैंने तो सुना है की आपको करोड़ों के सरकारी अनुदान मिलते हैं 

वो तो ज़रूरत का बहुत छोटा हिस्सा मिलता है 

और गैर सरकारी अनुदान भी तो मिलते हैं!

अच्छा अच्छा बहुत जानते हैं आप!  यहाँ क्यों आये?

जी, कार्यक्रम के लिए  ....

कैसे कलाकार हैं आप ? आपकी क्या योग्यता है?

जी मेरी योग्यता में कोई कमी नहीं है ••••

वो तो मेरे पास आने वाले सब ऐसा ही कहते हैं।

तो आपके अनुसार  योग्यता का क्या मापदंड है?

आप पद्म या अकादमी पुरस्कार प्राप्त तो पक्का नहीं ही हो ••••

जी आपको तो सब पता ही है ..... सही कहा आपने ••••

यार, तुम्हारे माता- पिता कलाकार हैं क्या?

नहीं, नहीं! ..... वे तो साधारण गृहस्थ थे ••••

तुम्हारे ख़ानदान में कोई बड़ा कलाकार?

जी नहीं। बड़ा तो क्या, दुर्भाग्य से मेरा कोई भी पुरखा सामान्य कलाकार भी नहीं था  ..... 

फ़िर कैसे?

जी? मैं समझा नहीं ••••

अरे भाई फिर कैसे कार्यक्रम दू्ँ मैं तुम्हें?                      

जी इसमें कोई दिक्कत है क्या?

एक हो तो बताएँ।

जी फिर भी कुछ पता तो चले ••••••

बताया तो ••••••

जी मैं समझा नहीं ••••••

क्या समझा नहीं समझा नहीं?? ...... अरे भाई, या तो पुरस्कृत बनो या किसी स्टार के पुत्र  ••••••

पर इन दोनों बातों पर मेरा नियंत्रण तो है नहीं •••••

क्या मतलब?

जी पुरस्कार हेतु गठित चयन समिति मेरी क्षमता  जान कर भी अन्जान बन जाती है ••••••  कई वर्षों से मेरा नाम अग्रसारित होता है पर पुरस्कार नहीं मिलता और......

और क्या?

और रही किसी स्टार कलाकार से मेरे रिश्ते की बात, तो मेरे माता -पिता कौन हों इस पर मेरा कोई नियंत्रण तो है नहीं ••••••

बड़े बदतमीज हो?

माफ़ी चाहता हूँ, पर मैंने जो कुछ भी कहा है, सच कहा है ••••••

अपना सच अपने पास ही रखो। मेरा दिमाग खराब मत करो।

जी नहीं कहूँगा। पर कार्यक्रम तो देंगे ना?

आखिर हमसे कार्यक्रम क्यों चाहते हो? हम तो पैसे भी नहीं देते  ..... 

पैसे तो देते हैं  ... 

वो तो ऊँट के मुंह में जीरे के समान है  .. 

फिर भी मैं तैयार हूँ  ..... 

हमारे तो कार्यक्रम भी बड़े ऑडिटोरियम में नहीं होते। 

मैं इसके लिए तैयार हूँ  .... 

स्कूलों - कालेजों  में बच्चों के बीच कार्यक्रम प्रस्तुति देनी होती  है।  सुविधाएं भी कम हैं  .... 

इसके लिए भी मैं तैयार हूँ   ..... 

एक दिन में कई कई कार्यक्रम करने पड़ते हैं।  कई बार तो आराम का मौका भी नहीं मिलता  .... 

फिर भी मैं तैयार हूँ  ..... 

उफ़्फ़  ....  आखिर मुफ़्त में कार्यक्रम करने को इतने उतावले क्यों हो ?

उसी कारण से, जिसके लिए बाकी स्टार पुत्र उतावले हैं  .... 

वे तो समाज और कला - संस्कृति की सेवा करने को उतावले हैं   .... 

यदि ऐसा आपको लगता है तो मुझे यह मौका क्यों नहीं देते?

यानि?

मैं भी तो समाज की सेवा करना चाहता हूँ   .... 

तो खुद करो।  हमारी सहायता क्यों चाहते हो?

वही ऊँट के मुंह में जीरे के लिए  .... 

भूल जाओ  .... 

जी?

तुम्हें कोई कार्यक्रम नहीं मिलेगा। यह मुँह और मसूर की दाल ?

पर मुझसे कम योग्य कलाकारों को तो आपने कार्यक्रम दिए हैं?

इसलिए दिए हैं, क्योंकि वे कोई एक योग्यता रखते हैं 

यानी?

यानि पुरस्कृत हैं अथवा स्टार पुत्र या पुत्री हैं 

पर.... 

क्या पर ?

पर कुछ तो ऐसे भी हैं जिनमें यह दोनों योग्यताएं नहीं हैं  ... 

वे हमारी संस्था के वरिष्ठ लोगों की संस्तुति से आये हैं 

तो मुझे भी संस्तुति दीजिये न अपनी  ....

नहीं देंगे। 

क्यों?

हमारी मर्ज़ी! ... 

पर  .. 

कोई पर- वर नहीं 

आखिर यह तो योग्यता का निरादर है ...... 

पड़ा होता रहे निरादर। नियम का पालन तो करना ही होगा। 

पर यह तो नियम ही अन्याय कर रहा है मेरे साथ  .......  

तो क्या करें?

तो ऐसे नियमों को तो बदल देना चाहिए ना  ... 

नियम बदल दें? कल को तुम कहोगे संस्था ही बदल दें  ... 

आप नहीं बदलेंगे तो समय बदल देगा।  बेहतर है समय रहते पहले आप बदल जाएँ। अब वह ज़माने गए जब आपका हुक्म ही सर्वोपरि होता था।  अब तो सरकार भी बदली है और निज़ाम भी।  समय रहते होश में आ गए तो ठीक है, वर्ना  .... 

वरना क्या?

वरना होश उड़ जायेंगे। मैं चला। 

Wednesday, November 23, 2016

नोटबन्दी और मैं ......

नोटबन्दी और मैं ...... 



यह तो पहले से ही तय था की ब्लॉग मेरी मर्ज़ी या कह लें मौज आने पर ही लिखूँगा।  मन हो तो कई और मन न हो तो एक भी नहीं। इसी नीति पर चलते हुए आज एक और पोस्ट लिख रहा हूँ।

दरअसल 500 - 1000 के नोटों को बन्द करने पर जो तूफ़ान सा आ गया है, उस पर मैंने अब तक अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। सोचा आज इस विषय पर लिखूं।  कुछ लोगों को पसन्द आये और शायद कुछ को न भी आये।  पर मैंने इसकी परवाह कब की है जो आज करूँगा? हाँ, इतना अवश्य है की उधार का नहीं पर जो कुछ खुद पर गुज़री है उसी के आधार पर लिखूँगा।

8 नवम्बर की तारीख से ही शुरू करता हूँ।  शाम को टीवी चैनल्स पर खबर आयी कि रात को 8 बजे प्रधानमंत्री जी राष्ट्र को सम्बोधित करने वाले हैं।  मुझे कुछ अटपटा सा लगा क्योंकि मन की बात तो वे करते ही रहते हैं। फिर इस विशेष सम्बोधन की क्या ज़रुरत थी? सो सब कुछ छोड़ कर टीवी देखने लगा। टीवी के ज्ञानी पत्रकार अटकलें भी लगाने लगे थे कि मोदी जी आखिर क्या कहना चाहते होंगे। कुछ ने तो 2  और 2 चार भी करना शुरू कर दिया था- दिन में मोदी जी तीनों सेनाओं के प्रमुखों से अलग अलग मिले हैं अतः ज़रूर पकिस्तान के साथ युद्ध से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा होगा। पर जब मोदी जी ने बोलना शुरू किया तो सबको अचम्भे में डाल दिया। यह तो मुद्दा ही कुछ और निकला!

घोषणा होने के बाद मेरे घर का तो दृश्य ही बदल गया। घर के कामों के लिए हाल ही में नगदी निकली थी। एटीएम से निकाली थी तो ज़ाहिर है "वही" नोट थे। मेरे तथा पत्नी के पर्स में जो भी नगदी थी (कुछ छिपा हुआ स्त्री धन भी) सब गिनी गयी और इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि कुछ दिन का इंतज़ार किया जा सकता है। 100 तथा 10 -20 के जितने नोट घर में थे वे तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त लगे। इस आर्थिक माथापच्ची के बीच टीवी भी देखा जा रहा था तथा उसमें सर्वज्ञानी पत्रकारों को भी चकराया हुआ देख कर परम सन्तुष्टि का अनुभव भी हो रहा था। अगले दिन बैंक तो बन्द ही थे।

पत्नी के विद्यालय में एक एटीएम है, जहाँ बिलकुल भीड़ नहीं थी तथा बड़े आराम से 100 - 100  के नोटों की शक्ल में 2000 रूपये निकल गए।  अब तो बिलकुल भी चिंता न थी।  अपने राम मस्त थे। महानगर में रहने के कारण राशन, दूध, सब्जी, फल, सीएनजी; यानि  सब कुछ तो कार्ड से खरीदा जा सकता था।

मज़ा तो तब आया जब हम कपड़ों की शॉपिंग करने निकले। बेटे के लिए स्वेटर आदि लेने आवश्यक हो गए थे। बाजार पहुंचे तो वहां का नज़ारा भी बदला  हुआ था। भीड़ बिलकुल कम और दुकानदार बिलकुल वीआईपी की तरह स्वागत करते दिखे। फुटपाथ पर भी पेटीएम के बोर्ड लगे थे।  अर्थात यदि नकदी न हो तो भी कोई बात नहीं. टैक्सी और ऑटो वाले तो पहले से ही कार्ड तथा पेटीएम से पैसे लेने लगे थे।

कुछ दिनों के बाद अपनी नगदी लेकर बैंक पहुँचा तो वहां भी सुखद अनुभव ही हुआ। बैंक के लोगों ने दो तीन फॉर्म दिए भरने को तथा पैसे जमा कर लिए। पूरी प्रक्रिया में 10 मिनटों से ज़्यादा नहीं लगे। भीड़ बिलकुल नहीं थी। विजयी मुद्रा में घर वापसी हुई और पत्नी से शाबासी मिली वह अलग।

व्हाटसअप तथा फ़ेसबुक में विभिन्न पोस्ट्स पढ़ कर जो अंदाज़ लगाया था वह बिलकुल ही निराधार निकला।  हाँ, एटीएम के आगे लाईनें ज़रूर लम्बी दिखीं। पर अब तो वो भी छोटी होती दिखाई दे रही हैं। और वह भी तब जब 50 दिनों  में से अभी 15  दिन  ही तो बीते हैं!

Tuesday, November 22, 2016

तो बालमुरलीकृष्णन नहीं रहे ......

तो बालमुरलीकृष्णन नहीं रहे ...... 


1988 में एक अद्भुत वीडियो आया था - मिले सुर मेरा तुम्हारा. संगीत एवं कला जगत की शीर्ष विभूतियों को लेकर बना दूरदर्शन का यह वीडियो आज भी अप्रतिम है. संगीत सीखते हुए तब कुछ वर्ष ही हुए थे तथा उत्तर भारतीय प्रमुख संगीतज्ञों से तो मैं परिचित था, परन्तु इस वीडियो के माध्यम से मेरा प्रथम परिचय दक्षिण भारत के कुछ महान संगीतज्ञों से हुआ जिनमें विद्वान एम0 बालमुरलीकृष्णन भी एक थे. उनकी एक तान और स्वर्णिम मुस्कान सीधे दिल को जा लगी. 1997-98 में भारत की स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती समारोहों के अवसर पर दूरदर्शन ने एक सीरीज उत्तर-दक्षिण जुगलबन्दी की बनाई जिसमें पण्डित भीमसेन जोशी के साथ विद्वान एम0 बालमुरलीकृष्णन के गायन की जुगलबन्दी में उन्हें लम्बे समय तक सुना और अभिभूत हुआ. अब तो मैं यदा-कदा बालमुरलीकृष्णन जी को सुनने लगा था तथा उनका प्रशंसक बन चुका था.

प्रत्यक्ष रूप से उन्हें देखने का मौका मिला वर्ष 2003 में, जब चेन्नई की सुप्रसिद्ध मद्रास म्यूज़िक अकादमी में प्रख्यात गायक पद्मभूषण विद्वान टी वी शंकरनारायणन को उस वर्ष का संगीत कलानिधि अवार्ड मिलने वाला था. अलंकरण समारोह में मुख्य अतिथि थे विद्वान एम0 बालमुरलीकृष्णन जी. मुझे आज भी याद है उस समारोह का गरिमामय वातावरण. अलंकरण के बाद विद्वान टी0 वी0 शंकरनारायणन जी को स्वीकृति-भाषण के लिए बुलाया गया. उनके तमिल और अंग्रेजी के मिले जुले भाषण में जो बात मुझे याद रह गयी वह यह थी कि बालमुरलीकृष्णन जी उनके कॉलेज के दिनों के हीरो थे. उनके ही पदचिन्हों पर चलते हुए आज शंकरनारायणन जी को यह मुकाम हासिल हुआ है. यह सब होने के पश्चात जब  विद्वान एम0 बालमुरलीकृष्णन जी को भाषण के लिए बुलाया गया, तो हाल में उपस्थित हर व्यक्ति ने खड़े होकर तालियाँ बजाते हुए जिस अंदाज़ में उनका स्वागत किया, वह अविस्मरणीय है.

प्रत्यक्ष रूप से उनका गायन सुनने का अवसर बहुत बाद में दिल्ली में आया. पर टी0 वी0  पर तथा यूट्यूब पर उनका गायन हमेशा सुनता रहता था. विशेष रूप से उनके गाये हुए 3 स्वरों तथा 4 स्वरों वाले रागों का गायन अद्भुत है. राग नियमों का पालन न करते हुए जो राग उन्होंने बनाये तथा उनमें कृतियाँ भी बनायीं, वह उनकी प्रतिभा का लोहा मनवा कर  ही रहती है. गायन ही नहीं वायलिन के भी वे अप्रतिम कलाकार थे.

उत्तर तथा दक्षिण भारतीय संगीत शैलियों को निकट लाने में उनका योगदान कभी भूला नहीं जा सकता. मेरे तथा संगीत जगत की ओर से  विद्वान एम0 बालमुरलीकृष्णन जी को श्रद्धांजली। 

Saturday, August 10, 2013

Bokaro Revisited

Bokaro has given me some of the most precious gifts. These include my music, my wife and my son. It was more than 1 year we left Bokaro and could not get opportunity to visit again. Therefore, Bokaro became the natural destination when I was planning my holidays. We reached Bokaro on 24th of July 2013 and stayed there till 29th. Staying at beautiful Bokaro Niwas and roaming across the roads of Bokaro was a pleasant experience which was so refreshing and we enjoyed each and every moment of it.

I could get time to visit DPS Bokaro and met so many of my lovely students. I could attend a function as well and it was pleasure to see DPS Bokaro team winning Zonal level Dance Competition and qualifying for National level. The school, staff and student will remain close to my heart always.

Meeting with my acquaintances and family friends was again a pleasure and we cherished each moment. I could get time to visit my birth place Jharia as well.

Some of the images are posted here taken during our stay at Bokaro.




















Tuesday, May 28, 2013

Dreams Unlimited

It was like dream come true. Rashtrapati Bhavan was always a center of attraction for me. Since my early childhood history of this beautiful building has always raised mixed emotions. From Gandhiji visiting this place to meet the then Viceroy to first swearing in ceremony under the leadership of Pt. Jawaharlal Nehru and from great Rajendra Babu to A.P.J. Abdul Kalam; all have added my curiosity to visit the place.

Today, on Tuesday the 28th Day of May 2013, I was fortunate enough to visit Rashtrapati Bhavan. I was invited as a guest at a award function held at historical Darbar Hall of Rashtrapati Bhavan. The entire ceremony was mesmerizing and very graceful. Later high tea was arranged and I got opportunity to see another historical place, the Ashoka Hall.

This will be a memorable evening of my life.

Sunday, February 3, 2013

बोकारो - मेरा पहला प्यार - 1

नोआमुंडी से आकर क्लास ५ में मेरा एडमिशन हुआ. उस समय मेरे पिताजी चास की गुजरात कोलोनी में रहा करते थे. उनका चाय पत्ती का व्यापार था. निम्न मध्यम वर्ग के परिवार की सारी समस्याओं का दर्पण था मेरा परिवार. एक कमरे का घर, उसमें हम चार लोग - मैं, छोटी बहन, माँ और पिताजी. साइकल पर सवार हो कर सुबह सवेरे जोधाडीह मोड़ के रामरुद्र उच्च विद्यालय जाना और दोपहर तक लौट आना. फिर शाम को दोस्तों के साथ घूमने के लिए बोकारो जाना. यहाँ बताना उचित होगा की चास और बोकारो में सिर्फ एक नदी गर्गा की सीमा रेखा है. नदी पर बने पुल के इस पार बसा है चास और उस पार बोकारो. बोकारो शहर बोकारो स्टील प्लांट के द्वारा बसाया गया आधुनिक शहर है जबकी चास स्थानीय निवासियों का पुराना शहर है. बोकारो की सफाई, चौड़ी सडकें, बिजली-पानी की अनवरत सुविधा और वहां के सुंदर आवास, चास के लोगों को आकर्षित करने के लिए काफी थे. बचपन में स्कूल की तो अनगिनत यादें जुडी हुई हैं. 








रामरुद्र उच्च विद्यालय की कक्षा ५ में मेरा एडमिशन हुआ १९७७ में. यही वर्ष था जब मेरा आगमन पूरी तरह से चास में हुआ. नोआमुंडी की सुंदर वादियों से चास शहर की चहल पहल में आना एक प्रकार का सांस्कृतिक परिवर्तन था मेरे लिए. स्कूल में जो मित्र शुरुआत में बने उनमें बदरी प्रसाद, बलराम सिंह, रसपाल सिंह, राजाराम, राहुल दोषी, विजय मेहता, सुभाष अग्रवाल, सतीश इत्यादि प्रमुख थे. बलराम का कक्षा ९ में दुखद देहांत हो गया. रसपाल सिंह, राजाराम, राहुल दोषी और सुभाष अग्रवाल अभी भी सम्पर्क में हैं. रामरुद्र उच्च विद्यालय का बहुत बड़ा परिसर था. एक छोटा सा होस्टल भी था जिसकी सब्जियों की आवश्यकता विद्यालय के किचन गार्डन से ही हो जाती थी. उसी बगीचे में बांस का एक झुरमुट भी था, जो हम दोस्तों का अड्डा हुआ करता था. 

Thursday, June 7, 2012

Venu Goonj - Riyaaz Workshop (June 1-6, 2012, New Delhi)


(Recently a workshop was organised at New Delhi in the first week of June 2012. Kumar Santosh has written a report on the same. I am uploading without any editing.)

Practice encompasses major role in any Performing Arts. But the practice must be done in presence of ‘GURU”. In olden days music and art were used as forms of worship and therefore the best place for its learning and practicing were found in and around temple or Guruji’s Ashram in the guidance of Guru. But in contemporary world time to live with Guruji in his Ashram is not possible.  But the requirement of Guru’s guidance while practicing any art form is strongly essential now also, since correct practice can only make us perfect, which is only possible with Guru’s Guidance. Keeping this theme in mind for reviving the practice and performing capacity of pupil a six days workshop “VENU GUNJ… A Riyaaz workshop” has been organized in New Delhi by one of the North Indian Classical Flute Maestro Pt. Chetan Joshi. Pupils from six major states of North India assembled in New Delhi in the Ashram (Home) of their Guru Pt. Chetan Joshi.
            
The eager of practicing with Guruji made the pupil so inquisitive that their arrival at Guruji’s Ashram started one day previous the workshop date. Two disciples Lakshmi Narayan   Mehta (Bihar) and Saurabh Barapatre (Madhya Pradesh) reached Guruji’s home in the morning of 31st May. Whole day both the disciples in supervision of Guruji were seriously engaged in the planning and arrangement of the Workshop.
           
Morning of the 1st June was bringing a new-fangled glee in pupil’s heart. All were enthusiastically waiting to meet Guruji to take his blessings.  Sameer Seth and Vikash Goswami (W.B.) also arrived at Guruji’s home in the morning. Santosh Kumar (U.P.) and Ashok (Jharkhand) also reached before the evening little late afternoon, as they were expected to reach in the morning but the train clogged them to do so. Anyway before the evening of the 1st June six disciples of Guruji and one new flute learner from Delhi Gaurav were ready to join the “Riyaaz Workshop” and gathered at the venue.
           
Subsequent to Puja offered to God by Guruji at 7 P.M. the workshop has been inaugurated. Now that time has came all pupil were looking towards Guruji to get some surreptitious of music practice. Guruji started the workshop with Alankars in Bilawal That.  But this was different; generally flutists play Shadaj by closing upper three holes of the flute. But this day Guruji told to make Shadaj by closing upper five and half holes of the flute, which normally makes Komal Dhaiwat. This leads to change the tone of the E scale flute to C scale. The Tabla machine switched on in little slow than medium tempo in Teen Taal. Initially the Laya of the alankar was one note each sixteen beat, which gradually increased till 4 notes each beat. This was weary experience for each student to play in different fingering style continuous one hour.  After two minutes rest next session of Alankar in Bilawal that but in normal fingering of E scale flute has been started. In which different alankars starting from lower octaves Pancham till higher octaves Pancham has been practiced along with alankars containing Layakari like ‘3 notes out of 4 beats’, 5 notes out of 4 beat. At the last session of the first day of Riyaaz workshop, Guruji taught Raga Durga. In this melodic pentatonic raga he taught alaap, and a composition in 16 beat. Now the practice sessions of the first day were over. Disciples were very much tired after continuous three hours practice.  But their faces were still glowing with a satisfaction of being in company with honorable Guruji.

Morning of the second June was planned to visit Mr. Subhash Thakur a renowned flute maker’s workshop to buy flutes. At 8 A.M. Subhas Ji came to Guruji’s place to take all of us to his workshop in his car. We all were staggered to see the bundles and bundles of flutes at one place. To chose out the perfect one for self was not easy especially among thousands of flutes. In words of Guruji “it was just like a hungry man get into five star hotels”. Everyone was busy to getting his own but actually all were confused since huge number of flutes stack. Anyway spenting more than five hours at Subhash Ji’s place every one was having a bag of flutes while returning back.
            
Practice sessions of second day workshop started at 7 P.M. This day two new peoples, Bhashkar Ranjan De a table player and Kamini Kanta Swain a painter also joined the workshop. This day in first session the alankar was practiced by making Komal Nishaad of normal fingering as Shadaj. Therefore different fingering again and the scale changed to D. This day again in very slow tempo of Teen Taal medium laya started like previous day session. It was strictly instructed by Guruji to not to increase laya. Every Layakari and different alankars was practiced in very slow tempo to manage the swaras at its pure place. This day in second session the alankars was played in Bhairavi that. In the third session Guruji taught Raga Malkauns composition in sixteen beat.
           
Third day was Sunday and all of us spent maximum time with Guruji and discussed on many different topics. After that it was planned to enjoy the day with own mood. Many of us went for marketing and few went to Lalit Kala Academy to visit painting exhibition. By 6 P.M. every one returned back to Guruji’s place and after tuning up for the music practice all were ready for the third day’s session of the workshop. This day the alankar started in Kalyan that. The process was just like previous day’s session in very slow tempo. This day Guruji instructed us to play differently. Started with one note in 4 beats we had practiced, 2 notes in 4 beat, 3 notes in 4 beat and gradually 10 notes in four beat. Many of the alankars mainly with tough Layakari was really hard to practice. This day continuously we practiced two hours nonstop. In the last session Guruji taught us a composition in Raga Hameer in 12 beats.
            
The first session of fourth day started with alankar making Komal Gandhar of natural fingering as Shadaj. The scale modified to G for using drone instrument. By making G as base scale different simple alankars in slow tempo like last day were practiced. After one hour in next session alankars in Kaafi that were practiced. In which different alankars based on different Layakari starting with 1 note in four beat to 12 notes in 4 beat were instructed by Guruji, which comprised of some difficult Layakari like five notes out of four beat and seven notes out of four beat were also learned by participants. Afterward, in the last session of the day Guruji started Raga Abhogi. After introducing the raga the alaap played by Guruji was mesmerizing. All were spell bound, than Guruji instructed all to play the notes after him. After Jod and Jhala Guruji started composition in Teen taal and taught each of us. While Guruji was playing Abhogi, suddenly a sensation experienced by the listeners when and how Guruji’s mood changed to Bageshwari followed by Kaafi and Bhairavi, was really a valued observe. At last on participants request Guruji performed Dadra in Bhairavi. One of the new things happens this day that a Delhi based photographer Dr. Marisha Sharma came to the venue to capture the moment of ‘Bamboo flutes gathering’ in her camera.
            
“Madhyam” the fifth perfect note of normal scale of north Indian flute choose as Shadaj by Guruji for alankar practice on fifth day of the workshop. After which some difficult alankars with Layakari has been instructed by Guruji for practice in that Poorvi. At the last of the sessions of the day Guruji taught Raga Poorvi. In which he played and taught alaap, Jod, followed by 16 beats composition in teen Taal.
            
6th June the last day of the workshop started with raga Darbari. Since many of the pupils had to leave on this day so the sessions became very short. But Darbari of this day was mesmerizing. Specially bandish “Jo guru kripa kare…”. Each word of the composition was taking us to the divinity where Guru was present to show the right path. Today Guruji had discussed many ragas closed to Darbari and also taught about the Kanhra Ang.

- Kumar Santosh (Varanasi, Uttar Pradesh)